परम पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री सौभाग्य सागरजी महाराज ने प्रवचन सभा में कहा कि मनुष्य देह, मन और आत्मा का मिला-जुला रूप है। ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ जो शरीर की अँग हैं, बाह्य जगत से संपर्क स्थापित करने में व्यस्त रहीत हैं। मन जो सर्वव्यापक है, चेतना के अहँकार एवं विवेक का केन्द्र है, परिस्थितियों की जाँच करने, अनुभव करने और सोच-विचार कर निर्णय लेने के लिए उत्तरदायी हैं। विवेकपूर्ण चिंतन के बाद मन निर्णय लेता है कि कैसी वाणी और कर्म लाभदायक, अनुकूल और उपयुक्त होंगे। यह अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य, सच और झूठ, नश्वर और अनश्वर का निर्णय करता हैआत्मा अथवा जीव अप्रभावी, स्थायी और सभी के मूल में है। यह सत्, चित् स्वरूप है। जब चित्त शुद्ध एवं निर्विकार हो, तो वह अवस्था विशुद्ध आनंदमय होती है। मनुष्य के जीवन का क्या उद्देश्य है?
अपने कर्म से प्रीति होना ही धर्म -आचार्य सौभाग्यसागर